छुट्टी थी...खाली बैठा था। मन में बार-बार देश और प्रदेश में चल रहे उठापटक को लेकर विचार उमड़ रहे थे। मन भारी सा हो उठा। बस फिर क्या अपने मन की टीस शब्दों में उकेरने की कोशिश में जुट गया... मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि भाजपा हो या फिर कांग्रेस दोनों की
देश और यहां की जनता का बट्टा लगाने में जुटी हुई है। अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती है। कभी उलजलूज बयान पर माहौल बनाते है तो कभी ऐसा कानून लाकर रख देते है कि जनता उलझी रहती है। मैं सिर्फ देश के विकास और जनता के हितों की बात करना चाहता हूं। दो दिन पहले एक नई सरकार प्रदेश में आई। आते ही तीन महीने बाद के लिए अपना सियासी रंग बनाने मुखिया ने कर्जा माफ कर दिया और करना भी चाहिए, क्योंकि इतिहास गवाह है पहले भी जिन्होंने कर्जा माफी का वादा किया है उन्हें सत्ता का सुख भोगने मिला है। इन्होंने भी दूरदर्शिता सोच के चलते यही कदम उठाया, राजनीतिक तौर पर इसे मैं गलत नहीं कह सकता। मुझे तो लगत है कि किसान सिर्फ सत्ता पाने का जरिया बनकर रह गया है। क्योंकि बात जब विकास की आती है तो यह कर्जा माफी जैसे चोचले घातक नजर आते है। मेरा मानना है कि देश के किसान का कर्जा माफ करने की बजाय उन्हें समृद्ध बनाया जाना चाहिए। उन्हें पारंपरिक खेती से आगे बढ़ाकर आधुनिक खेती की ओर ले जाने की पहल होना चाहिए। उन्हें फसलों का उचित मूल्य मिलना चाहिए। समय पर फसलों को पानी की व्यवस्था कराई जाना चाहिए। कुल मिलाकर मेरे कहने का लब्बोलुआब यह है कि किसान समृद्ध होगा तो उसे कर्जे की जरूरत ही नहीं पड़ेगी और देश में कर्जा माफी जैसे मुद्दा पर किसी को सत्ता का सुख भी नहीं मिलेगा। फिर हर कोई विकास की बात करेगा। आज हमारे देश का युवा बेरोजगार घूम रहा है। इन्हें सिर्फ वोट बैंक के तौर पर उपयोग किया जा रहा है। मन में उस समय खीज उठती है जब एक चपरासी की भर्ती के लिए एमबीए, इंजीनियरिंग पासआउट भी पहुंचते हैं। क्या उन्हें उनकी योग्यता मुताबिक नौकरी नहीं मिल सकती है। हा यह बात भी सही है कि नौकरी मिले भी कहा से हमारी सरकारें एट्रोसिटी एक्ट, धारा 370, हिंदू-मुस्लिम जैसे मामलों में जनता को उलझा कर रखती है। जनता को भी कोई काम नहीं रहता तो वह भी राजनीतिक मुद्दों को हवा देने में लग जाती है। जब बात विकास और रोजगार की आती है तो मुझे जब से याद है कोई भी जुलूस या धरना प्रदर्शन विकास और रोजगार जैसे मुद्दों पर नहीं हुआ। क्या हमारे देश में ऐसा नहीं हो सकता? क्या युवा अपना अधिकार नहीं चाहता? क्या युवा मिलकर एक जंग अपने लिए नहीं छेड़ सकता? क्या सरकार को इमानदारी से काम करने पर मजबूर नहीं कर सकते? क्यों न एक ऐसी लड़ाई छेड़ी जाए जिसमें न कोई हिंदू हो न मुस्लिम। सबमिल कर सिर्फ विकास और रोजगार कर बातें और आगे बढ़े।
देश और यहां की जनता का बट्टा लगाने में जुटी हुई है। अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती है। कभी उलजलूज बयान पर माहौल बनाते है तो कभी ऐसा कानून लाकर रख देते है कि जनता उलझी रहती है। मैं सिर्फ देश के विकास और जनता के हितों की बात करना चाहता हूं। दो दिन पहले एक नई सरकार प्रदेश में आई। आते ही तीन महीने बाद के लिए अपना सियासी रंग बनाने मुखिया ने कर्जा माफ कर दिया और करना भी चाहिए, क्योंकि इतिहास गवाह है पहले भी जिन्होंने कर्जा माफी का वादा किया है उन्हें सत्ता का सुख भोगने मिला है। इन्होंने भी दूरदर्शिता सोच के चलते यही कदम उठाया, राजनीतिक तौर पर इसे मैं गलत नहीं कह सकता। मुझे तो लगत है कि किसान सिर्फ सत्ता पाने का जरिया बनकर रह गया है। क्योंकि बात जब विकास की आती है तो यह कर्जा माफी जैसे चोचले घातक नजर आते है। मेरा मानना है कि देश के किसान का कर्जा माफ करने की बजाय उन्हें समृद्ध बनाया जाना चाहिए। उन्हें पारंपरिक खेती से आगे बढ़ाकर आधुनिक खेती की ओर ले जाने की पहल होना चाहिए। उन्हें फसलों का उचित मूल्य मिलना चाहिए। समय पर फसलों को पानी की व्यवस्था कराई जाना चाहिए। कुल मिलाकर मेरे कहने का लब्बोलुआब यह है कि किसान समृद्ध होगा तो उसे कर्जे की जरूरत ही नहीं पड़ेगी और देश में कर्जा माफी जैसे मुद्दा पर किसी को सत्ता का सुख भी नहीं मिलेगा। फिर हर कोई विकास की बात करेगा। आज हमारे देश का युवा बेरोजगार घूम रहा है। इन्हें सिर्फ वोट बैंक के तौर पर उपयोग किया जा रहा है। मन में उस समय खीज उठती है जब एक चपरासी की भर्ती के लिए एमबीए, इंजीनियरिंग पासआउट भी पहुंचते हैं। क्या उन्हें उनकी योग्यता मुताबिक नौकरी नहीं मिल सकती है। हा यह बात भी सही है कि नौकरी मिले भी कहा से हमारी सरकारें एट्रोसिटी एक्ट, धारा 370, हिंदू-मुस्लिम जैसे मामलों में जनता को उलझा कर रखती है। जनता को भी कोई काम नहीं रहता तो वह भी राजनीतिक मुद्दों को हवा देने में लग जाती है। जब बात विकास और रोजगार की आती है तो मुझे जब से याद है कोई भी जुलूस या धरना प्रदर्शन विकास और रोजगार जैसे मुद्दों पर नहीं हुआ। क्या हमारे देश में ऐसा नहीं हो सकता? क्या युवा अपना अधिकार नहीं चाहता? क्या युवा मिलकर एक जंग अपने लिए नहीं छेड़ सकता? क्या सरकार को इमानदारी से काम करने पर मजबूर नहीं कर सकते? क्यों न एक ऐसी लड़ाई छेड़ी जाए जिसमें न कोई हिंदू हो न मुस्लिम। सबमिल कर सिर्फ विकास और रोजगार कर बातें और आगे बढ़े।
🖋🖋जितेन्द्र तिवारी 🖋🖋

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